February 14, 2012:
सामान्य ज्ञान
निर्माण उद्योग
प्राथमिक उद्योग: प्रकृति प्रदत्त मटेरियल्स एकत्रित या उपलब्ध कराने से सबंद्ध क्रिया-कलाप, जैसे कृषि, खनन, मत्स्य पालन आदि. सहायक उद्योग: प्राथमिक उद्योग द्वारा प्रदत्त सामग्री को वस्तुओं में बदलकर प्रत्यक्ष रूप से मानव के लिए अधिक उपयोगी बनाने वाले उद्योग.
मूलभूत या मुख्य उद्योग: वे उद्योग, जो बहुत अधिक उद्योग इन पर निर्भर होने के कारण महत्वपूर्ण हैं.
उपभोक्ता उद्योग: प्राथमिक रूप से लोगों के उपभोग की वस्तुएं तैयार करने वाले उद्योग.
भारी उद्योग: भारी और बहुत अधिक कच्चा माल और तैयार उत्पाद और उसके बाद भाड़ा लागत से संबंद्ध उद्योग.
निर्माण उद्योग: मशीनरी का विस्तृत रूप से उपयोग कर, श्रम प्रभाग द्वारा योजना-बद्ध तरीके से उत्पादन करने वाले उद्योग.
बड़े-पैमाने के उद्योग: प्रत्येक इकाई में काम पर बहुत अधिक कर्मचारी नियोजित करने वाले उद्योग.
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग: जिन उद्योगों के आर्थिक क्रिया-कलापों का उत्तरदायित्व राज्य या एजेंसी का होता है और जो उत्पादन और वितरण के साधनों को नियंत्रण करती है.
निजी क्षेत्र के उद्योग: किसी व्यक्ति या फ़र्म के स्वामित्व वाला उद्योग.
नियोजित मजदूरों की संख्या के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण: बड़े उद्योग: एक यूनिट में बहुत अधिक मजदूर नियोजित करने वाले उद्योग बड़े उद्योग कहलाते हैं, जैसे कपास या जूट, कपड़ा उद्योग. मझले उद्योग: प्रत्येक यूनिट में अपेक्षाकृत कम मजदूर नियोजित करने वाले उद्योग, मझले उद्योग कहलाते हैं. ऐसे उद्योगों में पूंजी बचत मिलियन रू. के ¾ से कम है. रेडियो, टेलिविजन, साइकिल और कंप्यूटर कंपनी इत्यादि उद्योग कुछ ऐसे ही उद्योग हैं. लघु उद्योग: स्थानीय जरूरतों का प्रबंध करने वाले उद्योग, जो बहुत कम लोगों को नियोजित करते हैं और जिसे प्रारंभ करने के लिए कम धन राशि की आवश्यकता होती है, लघु उद्योग कहलाते हैं. भारत सरकार SSI (Small Scale Industries) यूनिट के सेटअप हेतु विभिन्न छूट और लोन प्रदान करती है. उदाहरण: साबुन बनाना, शिक्षा प्रशिक्षण केन्द्र, कंप्यूटर हार्डवेयर यूनिट इत्यादि कुछ उद्योग ऐसे ही उदाहरण हैं.
उद्योगों को उनके उत्पाद या उपयोग की गई सामग्री के आधार पर निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया सकता है: प्राथमिक उद्योग: प्रकृति प्रदत्त मटेरियल्स एकत्रित या उपलब्ध कराने से सबंद्ध क्रिया-कलाप, प्राथमिक उद्योग कहलाते हैं, जौसे, खनन, संग्रह करना और मत्स्य पालन उद्योग. सहायक उद्योग: प्राथमिक उद्योग द्वारा प्रदत्त मटेरियल्स को वस्तुओं में बदलकर अधिक प्रत्यक्ष रूप से मानव उपयोगी बनाने वाले उद्योग, सहायक उद्योग कहलाते हैं. जैसे, चीनी, कागज और कपड़ा उद्योग. पिछ्ड़े उद्योग: ये वे उद्योग हैं, जो आधुनिक उद्योगों को उत्कृष्टता से बड़े रूप में चलाने के लिए आवश्यक हैं, बैंकिंग और परिवहन कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं.
भारत में जूट उत्पादन
भारत में 90% जूट उत्पादन गंगा-ब्रहमपुत्र के डेल्टा में होता है. जिसके कारण वहां जूट की प्रर्याप्त और नियमित आपूर्ति है. हालांकि, बिहार, तमिलनाडु, यूपी में कुछ जूट मिल हैं, लेकिन यह उद्योग मुख्य रूप से (हुगली नदी के किनारे) पं बंगाल में केंद्रित है. इस क्षेत्र में 100 से अधिक मिल हैं. जूट कपड़ा उद्योग हमारे विदेशी विनिमय आमदनी की सूची के शीर्ष में है. कारण: पं. बंगाल जूट का संगह-घर है. यहां सबसे अधिक जूट के कपड़े का उत्पादन होता है. यह बांग्लादेश के पास में है, जहां अधिकांश जूट मिल हैं, लेकिन विभाजन के बाद कई जूट मिल अब बांग्लादेश में हैं. इस उद्योग के लिए बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है, जो हुगली नदी नदी से आसानी से उपलब्ध है. जूट फ़ैक्टियों की स्थापना और इन्हें चलाने के लिऐ आवश्यक लोहा और कोयला भी पास के रानीगंज खानों से उपलब्ध है, जो 200 किमी. से कम दूरी पर है. यदि जूट के कुछ और अधिक कच्चे सामग्री की आवश्यकता होती है, तो उसका आसानी से बांग्लादेश से आयात किया जा सकता है. कोलकाता एक अच्छा बन्दरगाह है, जो समुद्री जहाजों के अपने अच्छे नेटवर्क से विश्व के अन्य देशों में जूट निर्माताओं को आसानी से निर्यात कर सकता है. हुगली नदी जूट और जूट सामान धोने के लिए उद्योग को पर्याप्त ताज़ा पानी प्रदान करती है. सस्ती और उचित पन-बिजली दामोदर घाटी कॉर्पोरेशन से (DVC) उपलब्ध है. घनी आबादी वाले राज्य, पं बंगाल, बिहार और उ.प्र. से कुशल और अकुशल मजदूर उपलब्ध हैं. वहां वित्त बचत की आवश्यकता नहीं है.
भारत में कपड़ा उद्योग
सूत, जूट, रेशम और ऊन कपड़ा उद्योग की मूल कच्चे सामग्री हैं. सूती कपड़ा उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है क्योंकि, भारत में कताई और बुनाई चरखे बहुत पहले से उपयोग में रहे हैं. कपड़ा मिल दो प्रकार के हैं. कुछ ;कम्पोजिट कपड़ा मिल’ जबकि अन्य ‘बुनाई कपड़ा मिल’ हैं. ‘कम्पोजिट कपड़ा मिल में कताई और बुनाई दोनों काम किए जाते हैं, जबकि बुनाई मिल में केवल बुनाई का काम होता है. बुनाई मिलों से तैयार यार्न हैंडलूम और पॉवरलूम, दोनों से बुना जाता है. सूती कपड़ा उद्योग कई कारणों से मुख्यत: गुजरात (अहमदाबाद), महाराष्ट्र (मुंबई) में केंद्रित है. कपास के लिए इन राज्यों की काली मिट्टी या खेती सर्वोत्तम है. इन राज्यों का तापमान गर्म है. बिजली और सस्ते मजूदूर प्रचुर मात्रा में हैं. वहां परिवहन के बेहतर साधन हैं और रेल और सड़कों से देश के अन्य भागों से जुड़े हुए हैं. इन राज्यों की जनसंख्या बहुत अधिक होने के कारण इस उद्योग के उत्पाद स्थानीय बाज़ार में भी उपलब्ध कराए जाते हैं. ये राज्य अरब, अफ़्रीका और यूरोप के देशों के और करीब हैं. जो कपड़े का बहुत अधिक आयात करते हैं. जूट कपड़ा उद्योग का हमारी विदेशी विनियमय कमाई की सूची के शीर्ष स्थान पर है. प्रथम जूट मिल 1859 में कोलकाता में लगाई गई थी. वहां 66 से अधिक जूट मिल हैं, जहां से जूट के सामान का 1.39 मिलियन टन उत्पादन होता है. ये अधिकांशत: पं बंगाल, बिहार और तमिलनाडु, अमृतसर, धारीवाल, लुधियाना, कानपुर, मुंबई, बेंग्लोर, जामनगर, श्रीनगर, आदि जगहों पर स्थित, और ऊनी कपड़े के मुख्य केंद्र हैं. भारत का रेशम विश्व-भर में प्रसद्धि है. रेशम के कीड़े अधिकांश शहतूत के पत्तों पर पलते हैं. रेशम का उत्पादन मुख्यत: कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में होता है. प्रमुख रेशम बुनाई के केंद्र मैसूर, वाराणसी, श्रीनगर, अमृतसर और कांचीपुरम में है.
संघटित और मिनी स्टील प्लांट्स में अंतर. संघटित स्टील प्लांट का आकार, मिनी स्टील प्लांट्स की तुलना में अधिक बड़ा होता है. संघटित स्टील प्लांट कच्चे माल से लेकर स्टील बनाने, रोलिंग और उसे आकार देने के लिए के एक संयुक्त प्रक्रिया करते हैं जबकि मिनी स्टील प्लांट, संघटित स्टील प्लांट द्वारा सप्लाई किए गए स्टील का कबाड़, स्पोंज स्टील आयरन और कभी-कभी स्टील इग्नोट्स उपयोग करते हैं. संघटित स्टील प्लांट सभी प्रकार का स्टील बनाते हैं, लेकिन मिनी स्टील प्लांट केवल दिए गए विनिर्देश का माइल्ड और अलॉय स्टील का उत्पादन करते हैं. स्टील उद्योग के सामने आई समस्याएं इसे विभिन्न स्टील उप्तादक देशों के बीच जटिल प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा, विशेष रूप से चीन. इसे कोगिंग कोयला की उच्च कीमत और बिजली की अनियमित मात्रा का सामना करना पड़ा. कभी-कभी इस उद्योग को बाहर के देशों से अच्छी गुणवत्ता का स्टील आयात करना पड़ता है. इसका इंफ़्रास्ट्रक्चर निम्न स्तर का है. इसमें उत्पादकता श्रम से कम है. उत्पादन बढ़ाने के लिए नवीनतम विकास: उदारीकरण से इस उद्योग को बहुत अधिक सहायता मिली है. व्यक्तिगत इंटर्प्रनेअर के प्रयासों से प्रत्यक्ष बचत दोगुना हुआ है, जो आगे इस उद्योग के विकास को बढ़ाते हैं. हमारी घरेलू मांग पूरा करने के लिए कुल उत्पादन पर्याप्त है.
भारत में सूती कपड़ा उद्योग निम्न कारणों से मुंबई और अहमदाबाद के चारों ओर बहुत संख्या में केंदित हैं: कच्चे माल की उपलब्धता: मुंबई और अहमदाबाद के आस-पास कपास का अत्यधिक उत्पादन होता है. अत: इनसे सबंद्ध क्षेत्रों में उद्योग के लिए आवशयक मूल कच्चे माल की नियमित आपूर्ति होती है. अनुकूल तापमान: समुद्री तापमान में उष्ण होने के कारण यह उपयुक्त तापमान है, और जिससे धागा प्राय: नहीं टूटता है. इसलिए इन क्षेत्रों का तापमान सूती कपड़े के लिए अनुकूल है. बंदरगाह सुविधा: मुंबई एक प्रमुख समुद्री बंदरगाह है. अच्छी गुणवत्ता का कपास, मशीन और कच्चा माल आसानी से आयात किए जाते हैं और तैयार किए गए उत्पाद आसानी से बाहर के देशों को निर्यात किए जाते हैं. टाटा पन-बिजली केंद्र के बिहार और खपोली केंद्रों से बिजली उपलब्ध है. यातायात सुविधा: ये दोनों केंद्र यातायात के सुलभ साधनों से देश के शेष भागों से जुड़े हुए हैं. जिससे प्रशिक्षित मजदूर एक जगह से दूसरी जगह आसानी से आ-जा सकते हैं. और तैयार उत्पाद बिक्री हेतु स्थानीय बाज़ार में आसानी से भेजे जा सकते हैं.
लोहा और स्टील उद्योग
लोहा और स्टील उद्योग एक प्रमुख उद्योग है. आजादी से पहले निजी क्षेत्र में लोहे और स्टील के केवल तीन प्लांट थे. जो इस प्रकार हैं: जमशेदपुर में टाटा आइरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को), बुरहानपुर में इंडियन आइरन एंड स्टील कंपनी और कर्नाटक के भद्रावती में आइरन एंड स्टील प्लांट. लेकिन स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला में सोवियत रूप, ब्रिटेन और जर्मनी के सहयोग से तीन संघटित स्टील प्लांट प्रारंभ किए. भारत की आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में क्रमश: विशाखापट्टनम, विजयनगर और सलेम में तीन और अधिक प्लांट लगाने की योजना है. भारत के प्रमुख स्टील प्लांट: टाटा स्टील प्लांट जमशेदपुर, झारखंड. यह निजी क्षेत्र का प्लांट है. यह 1907 में भारत में स्थापित प्रमुख स्टील प्लांट था. 1950-51 तक यहां 1.5 मिलियन टन का कच्चा लोहा और 1 मिलियन टन स्टील उत्पादन होने लगा था. अब इसकी उत्पादन क्षमता दोगुनी हो गई है. भिलाई स्टील प्लांट, छत्तीसगढ़: यह स्टील प्लांट सोवियत संघ की मदद और सहयोग से भिलाई, छत्तीसगढ़ में लगाया गया था. द्वितीय प्लांट (1956-61) के दौरान इसकी प्रारंभिक उत्पादन क्षमता 10 लाख टन कच्चा लोहा थी, जो 1979-80 में 2.1 मिलियन टन हो गई. अगले पंच-वर्षीय योजना में इसकी उप्तादन क्षमता और बढ़ गई और इसके बिक्री योग्य स्टील का उत्पादन 1996-97 में 3.4 मिलियन टन हो गया. दुर्गापुर स्टील प्लांट, पं बंगाल: भिलाई और राउरकेला स्टील प्लांटस के अतिरिक्त यह प्लांट भी सार्वजनिक क्षेत्र का प्लांट है. भिलाई स्टील प्लांट रूप की मदद और सहयोग से लगाया गया था, दुर्गापुर स्टील प्लांट ब्रिटेन के सहयोग से लगाया गया. हालांकि, इस प्लांट ने भिलाई और राउरकेला स्टील प्लांट्स के साथ ही द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में कार्य करना शुरू कर दिया था. इसके ब्रिक्री योग्य स्टील उत्पादन क्षमता 1996-97 में 1.1 मिलियन टन थी. राउरकेला स्टील प्लांट, उड़ीसा: जैसा कि ऊपर बताया गया है कि यह प्लांट सार्वजनिक क्षेत्र में द्वितीय पंच-वर्षीय योजना (1956-61) के दौरान लगाया गया था. यह प्लांट उड़ीसा में जर्मनी के सहयोग से लगाया गया था. इसकी ब्रिक्री योग्य स्टील की उत्पादन क्षमता 1996-97 में 1.2 मिलियन टन थी. विशाखापट्टनम स्टील प्लांट: यह आंध्रप्रदेश में स्थित है. यह हमारे देश में प्रथम समुद्र के किनारे स्थित संघटित स्टील प्लांट है. 1997-98 में यहां 2.2 मिलियन टन बिक्री योग्य स्टील और आधा मिलियन टन कच्चे लोहे का उत्पादन हुआ था. इसने अन्य देशों को स्टील और कच्चा लोहा अन्य देशों को निर्यात कर 1997-98 में 600 करोड़ का विदेशी विनिमय किया था.औद्योगिक प्रदूषण और वातावरण का निम्नीकरण: औद्योगीकरण की त्वरित प्रक्रिया से सभी मायनों में कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुई हैं. इससे कई प्रकार से वातावरण को प्रदूषित और घटिया कर दिया है. वायु में खतरनाक बहि:स्राव धुआं छोड़ना: अपना उत्पादन बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार की फ़ैक्ट्रियां दिन या दिन के बाद कोयला, खनिज तेल गैस उपयोग करते हैं. इस तरह से हवा में कई खतरनाक तत्व और धुआं छोड़ते हैं, जिससे हवा में प्रदूषण और वातावरण घटिया होता है. पानी में बहुत अधिक रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ और कूड़ा बहाना: लगभग सभी उद्योग पानी में बहुत अधिक रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ और कूड़ा बहाकर पानी को दूषित करते हैं. कभी-कभी यह पानी जहरीला हो जाता है और जहां भी यह बहता है, तबाही फैलाता है. भूमि के निम्नीकरण का कारण: फ़ैक्टरियों के हानिकारक बहि:स्राव और उनके रासायनिक अपशिष्ट भूमि को नहीं बचाते हैं. दूषित पानी को आगे बहने का रास्ता न मिलने पर वह किसी विशेष स्थान पर एकत्रित हो जाता है, इस पानी से भूमि दुदर्शा और अनुपयोगी हो जाती है. भू-जल को संदूषित करना: जब यह फ़ैक्ट्रियों के हानिकारक तत्व शामिल वाला पानी अधिक समय तक किसी स्थान पर एकत्रित रहने दिया जाता है, धीरे-धीरे यह भूमि के अंदर रिसता है और मुक्त रूप से भू-जल में मिल जाता है. पर्यावरण पर औद्योगिक गंदी बस्तियों का प्रभाव: सामान्यत: मजदूर फ़ैक्ट्रियों के आस-पास झोपड़ियां लगाते हैं और जल्दी ही स्लम का प्रादुर्भाव होने लगता है. झुग्गी वासी खुले स्थान पर मल-त्याग करते हैं और पूरे वातावरण को प्रदूषित करते हैं. औद्योगीकरण से जनसंख्या में तीव्र गति से बृद्धि हुई है और परिणामस्वरूप वातावरण का निम्नीकरण किया है: अद्योगीकरण ने इस विश्व को बहु-जनसंख्या की भूमि बनाया, जिसके परिणाम-स्वरूप जनसंख्या विस्फ़ोट हुआ. लोगों की अधिक संख्या, जनसंख्या अधिक खतरे में.
पर्यावरण का अपमान नियंत्रित करने के माप: हाइड्रो-इलेक्ट्रिसिटी या हाइडल पॉवर: सर्वप्रथम, यह सुझाव दिया जाता है कि थर्मल पॉवर उपयोग करने के बजाय, जो जलते हुए कोयले से बनती है, खनिज तेल या गैस पन-बिजली उपयोग की जानी चाहिए. पन-बिजली, प्रदूषण मुक्त होने के साथ-साथ बिजली का अक्षय स्रोत है. भारत में जल-विद्युत की अपार संभावनाएं हैं. थर्मल प्लांट के लिए उच्च गुणवत्ता के कोयले का उपयोग: यह सुझाव दिया जाता है कि, यदि किसी परिस्थितित में, कुछ क्षेत्रों में, बिजली उत्पादन के लिए थर्मल प्लांट में कोयले का उपयोग किया जाना है, तो इस स्थिति में केवल उच्च गुणवत्ता का कोयला उपयोग किया जाना चाहिए, जो कम धुआं छोड़ता है, लेकिन अधिक उष्मान देता है और जिससे अधिक बिजली उत्पादन होता है. फ़ैक्ट्रियों को नगर की सीमाओं से बाहर शिफ़्ट करना: वे सभी फ़ैक्ट्रियां, जो हानिकारक बहि:स्राव और हवा में धुआं छोड़ते हैं, या जो नजदीक के दरिया या नदियों में गंदा पाने छोड़ते हैं, वे नगर की सीमा से बाहर शिफ्ट किए जाने चाहिए, ताकि वे शहरी क्षेत्र में प्रदूषण न फैलाएं. गंदे पानी को साफ़ कर छोड़ना: फैक्ट्रियों के गंदे पानी को नजदीकी दरिया या नदी में बहाए जाने से पहले साफ़ किया जाना आवश्यक है. पानी रिसायकल करना: यह बेहतर होगा यदि फ़ैक्ट्रियां अपने अपशिष्ट पानी को वैज्ञानिक विधि से साफ़ कर बार-बार उपयोग करने की व्यवस्था करें. प्रदूषण जांच और पर्यावरण की दुदर्शा के कड़े नियम लागू करना: जो उद्योगपति कारण नहीं देखते हैं, उन पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए, ताकि वे या तो सरकार या अज्ञान जनता के लिए कोई कारण बनने का साहस न करें. वृक्ष लगाकर और छोटे-जंगल के क्षेत्र बनाकर-फ़ैक्टी स्वामियों को उनकी फ़ैक्टियों के चारों ओर वृक्ष लगाने के लिए प्रोत्साहित और इनाम भी देना चाहिए. ऐसी माप प्रदूषण और पर्यावरण की दुदर्शा को कम करेगी.
स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार द्वारा स्थापित उद्योग इस प्रकार हैं: लोहा और स्टील: जब भारत आजाद हुआ, वहां लोहा और स्टील उत्पादन के केवल दो मुख्य यूनिट थे. अब वहां कई मुख्य स्टील प्लांट हैं, जैसे भिलाई, दुर्गापुर, बोकारो, राउरकेला, जमशेदपुर, बुर्नपुर और भद्रावती. इनमें से भिलाई, दुर्गापुर, बोकारो और राउरकेला स्वतंत्रता के बाद स्थापित किए गए थे. हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन: हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन, रांची, चीनी, सीमेंट, पेपर, कपड़ा और, लोहा और स्टील उद्योगों के लिए भी विभिन्न प्रकार के संपूर्ण मशीन प्लांट्स बना सकता है. हिन्दुस्तान मशीन टूल्स (या H.M.T): इसके भिन्न-भिन्न स्थान, जैसे बेंग्लोर (कर्नाटक), पिंजोर (हरियाणा), हैदराबाद (आंध्रप्रदेश) और कालामाश्वेरी (केरल) में कई विनिर्माण यूनिट हैं, जो छोटी और मध्यम आकार की मशीन उत्पादन में संलिप्त हैं. H.M.T. प्रतिदिन 1000 से अधिक घड़ियों का उत्पादन करती है. खाद उद्योग: भारत में इस समय सिंदरी, नांगल, ट्राम्बे, गोरखपुर, नमरूप, दुर्गापुर, बराऊनी, रामगागुंदम, तलचर, हल्दिया, अलावे, कोचीन, मद्रास (चेन्नई), राउरकेला और नायवेली में खाद फ़ैक्ट्रियां हैं. रासायनिक दवा और दवाई उद्योग: यह उद्योग भी स्वतंत्रता के बाद स्थापित क्रिया गया था. इस समय हमारे वहां पिम्परी के पास में पूना में हिन्दुस्तान एंटीबायोटिक्स, ऋशिकेष में एंटीबायोटिक्स प्लांट, सिंथैटिक प्लांट, हैदराबाद, दिल्ली व अलावे में हिन्दुस्तान इनसेक्टीसाइड्स फ़ैक्ट्रियां हैं, जो आम दवा बनाते हैं. भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (बीएचईएल): यह 1984 में स्थापित किया गया था. इसके निम्न 6 यूनिट हैं, जो भोपाल, तिरूचिरापल्ली, हैदराबाद, हरिद्वार, जम्मू और बेंग्लोर. इन यूनिट्स में हैवी इलेक्ट्रिकल उद्योग के लिए भारी संख्या में आइटम्स का उत्पादन करते हैं, जैसे जेनरेटर, ट्रांसफ़ार्मर, वाटर टर्बाइन और स्ट्रीन टर्बाइन. खनिज और तेल उद्योग: स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने खनिज तेल की खुदाई और संशोधित करने की ओर ध्यान दिया. परिणाम स्वरूप, कई स्थान, जैसे नूनामती, ब्राओनी, कोयाली, मद्रास (चेन्नई) कोच्चि, हल्दिया, बोंगाइगांव और मथुरा में तेल रिफ़ाइनरीज़ स्थापित हुईं.